| Franz WAGNER |
 |
| Nationalität: Österreich |
| geboren am 23. 9. 1911 |
| gestorben am 8. 12. 1974 |
| Position: Läufer |
| 6 x Österreichischer Meister (1935, 1938, 1940,
1941, 1946, 1948) |
| Österreichischer Cupsieger 1946 |
| Deutscher Meister 1941 |
| Deutscher Pokalsieger 1938 |
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| 1931-1949 bei Rapid |
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Meisterschaft |
Cup |
Deutsche Meisterschaft |
Deutscher Pokal |
Mitropacup |
| Saison |
Spiele |
Tore |
Erfolg |
Spiele |
Erfolg |
Spiele |
Erfolg |
Spiele |
Erfolg |
Spiele |
Erfolg |
| 1930/31 |
3 |
|
3. Platz |
2 |
Platz 7 |
|
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|
|
|
|
| 1931/32 |
22 |
|
3. Platz |
4 |
Semifinale |
|
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| 1932/33 |
21 |
1 |
2. Platz |
2 |
Achtelfinale |
|
|
|
|
|
|
| 1933/34 |
22 |
|
2. Platz |
5 |
Finale |
|
|
|
|
4 |
Zwischenrunde |
| 1934/35 |
21 |
|
Meister |
6 |
Semifinale |
|
|
|
|
2 |
Vorrunde |
| 1935/36 |
12 |
|
3. Platz |
1 |
2. Runde |
|
|
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|
|
|
| 1936/37 |
13 |
|
5. Platz |
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1937/38 |
13 |
|
Meister |
1 |
Achtelfinale |
|
|
|
|
|
|
| 1938/39 |
17 |
|
3. Platz |
|
|
|
|
4 |
Cupsieger |
|
|
| 1939/40 |
11 |
|
Meister |
|
|
6 |
3. Platz |
6 |
Semifinale |
|
|
| 1940/41 |
17 |
|
Meister |
|
|
8 |
Meister |
5 |
Semifinale |
|
|
| 1941/42 |
12 |
|
3. Platz |
|
|
|
|
2 |
2. Runde |
|
|
| 1942/43 |
1 |
|
6. Platz |
|
|
|
|
|
|
|
|
| 1945/46 |
13 |
|
Meister |
4 |
Cupsieger |
|
|
|
|
|
|
| 1946/47 |
17 |
|
2. Platz |
3 |
Viertelfinale |
|
|
|
|
|
|
| 1947/48 |
15 |
|
Meister |
2 |
Viertelfinale |
|
|
|
|
|
|
| 1948/49 |
7 |
|
2. Platz |
|
|
|
|
|
|
|
|
| Gesamt |
237 |
1 |
|
30 |
|
14 |
|
17 |
|
6 |
|
|
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| andere Vereine |
| Cricket (bis 1931), Markersdorf (1944) |
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| 18 Länderspiele für Österreich (1933-1936;
WM-Vierter 1934) |
| 3 Länderspiele für Deutschland (1938-1942;
WM-Teilnehmer 1938) |
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Nach dem Mitropacupsieg 1930 suchte Rapid nach dam
Abgang Karl Rappans in die Schweiz einen Spieler für die Position
des rechten Läufers. Da wurde man auf den 19-jährigen Franz Wagner
aufmerksam, der damals bei den Cricketern spielte. Am 10. Mai 1931
absolvierte Wagner sein erstes Meisterschaftsspiel beim 4:3-Sieg über
die Austria und diese Position sollte er bei Rapid fast 20 Jahre lang
ausfüllen. 237 Meisterschaftsspiele absolvierte er für die Grün-Weißen,
errang dabei sechs Mal den Titel. Er erzielte dabei ein einziges Tor,
beim 4:1-Sieg über Wacker am 25. 9. 1932. 1938 wurde er mit Rapid
Deutscher Pokalsieger, 1941 Deutscher Meister.
Zwischen 1933 und 1936 spielte er auch 18 Mal im österreichischen
Nationalteam, wurde bei der Weltmeisterschaft 1934 für das All-Star-Team
nominiert. Er nahm auch 1938 bei der WM - diesmal für Deutschland
- teil. Nach seiner aktiven Laufbahn blieb er Rapid als Nachwuchstrainer
treu und übernahm in der Saison 1955/56 auch für einige Monate die
Betreuung der Kampfmannschaft, führte das Team dabei zum Meistertitel.
Ende der 50er-Jahre wurde er dann Jugendtrainer beim WAC. Er starb
1974 63-jährig in Wien. |
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